Bhagat Singh Essay in Hindi (1)

Bhagat Singh Essay in Hindi

Bhagat Singh Essay in Hindi: भगत सिंह का जन्म वर्तमान पाकिस्तान के लायलपुर, बंगा गांव में हुआ था। उनका परिवार स्वामी दयानंद के विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित था। कहते हैं ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’ भगत सिंह के बचपन के कारनामों को ही देख कर लोगों को यह आभाष हो गया था की वह वीर, धीर और निर्भीक हैं।

Bhagat Singh Essay in Hindi

भगत सिंह के जन्म के समय पर उनके पिता “सरदार किशन सिंह” व उनके दोनों चाचा “सरदार अजित सिंह” तथा “सरदार स्वर्ण सिंह” ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ होने के वजह से जेल में बंद थे। जिस दिन उनका जन्म हुआ उसी दिन उन्हें जेल से रिहा किया गया। ऐसे में भगत सिंह के घर में खुशियों की बाढ़ सी आ गई। अतः भगत सिंह की दादी ने उनका नाम “भागो वाला” अर्थात भाग्यशाली रख दिया।

भगत सिंह जन्म

भगत सिंह जी भारत के क्रांतिकरी युवाओं में से एक थे। भगत सिंह जी का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पाकिस्तान के बंगा में हुआ था। भगत सिंह जी के पिता का नाम सरदार किशन सिंह संधू था और माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह जी एक सिक्ख थे। भगत सिंह जी की दादी ने इनका नाम भागाँवाला रखा था क्योंकि उनकी दादी जी का कहना था कि यह बच्चा बड़ा भाग्यशाली होगा।

भगत सिंह शिक्षा

भगत सिंह जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव से पूरी की थी। भगत सिंह जी ने 1916 से 1917 में डी. ए. वी. कॉलेज से अपनी हाईस्कूल की परीक्षा को पास किया था। डी. ए. वी. करने के बाद उन्होंने नेशनल कॉलेज से बी. ए. की थी। भगत सिंह जी ने सन् 1923 में एफ. ए. की परीक्षा उतीर्ण की थी।

भगत सिंह का जीवन

भगत सिंह जी बचपन से ही निर्भीक प्रवृति के थे। वे बचपन से ही वीरों के खेल खेला करते थे। वे अक्सर दो दल बनाकर लड़ाई करना और तीर कमान चलाने जैसे खेल खेला करते थे। बचपन से ही उनमें देशप्रेम की भावना कूट-कूटकर भरी थी।

बचपन में भगत सिंह जी ने अपने पिता की बंदूक को खेत में गाढ़ दिया था। जब उनके पिता ने इस काम का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि एक बंदूक से कई बंदूके होंगी और उन्हें मैं अपने साथियों में बाँट दूंगा। इनसे हम अंग्रेजों से लड़ेंगे और भारत माता को आजाद करायेंगे।

जनरल डायर ने सन् 1919 में जलियाँवाला बाग में गोलिया चलवाई थीं जिसकी वजह से हजारों बेकसूर और निहत्थे लोग मारे गये थे। उस समय भगत सिंह सिर्फ 11 साल के थे तब उन्होंने बाग की मिटटी को सिर से छूकर भारत को स्वतंत्र कराने के लिए जीवन भर संघर्ष करने की प्रतिज्ञा ली थी।

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भगत सिंह जी जब डी. ए. वी. की परीक्षा के समय उन्होंने जुगलकिशोर, भाई परमानंद और जयचन्द्र विद्यालंकार जैसे क्रांतिकारियों से दोस्ती की थी और वे पढाई करने के साथ-साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग भी लेते थे। उनके दोस्तों की वजह से ही उनकी पहचान लाला लाजपतराय से हुई थी। एफ. ए. के बाद उनके विवाह की तैयारियां की जाने लगी थीं जिसकी वजह से उन्हें घर छोड़ना पड़ा और कानपुर चले गये।

भगत सिंह का संकल्प

जलियांवाला बाग के हत्याकांड के बाद लाल लाजपतराय की मृत्यु हो गयी थी जिसकी वजह से भगत सिंह को बहुत गहरा धक्का लगा था। इस वजह से वे ब्रिटिश क्रूरता को सहन नहीं कर सके और लाल लाजपतराय की मृत्यु का बदला लेने का निश्चय किया। इस बदले को शुरू करने के लिए उनका पहला कदम सॉन्डर्स को मारना था। सॉन्डर्स को मारने के बाद उन्होंने विधानसभा सत्र के दौरान केंद्रीय संसद में बम्ब फेंका था। उन्हें अपने किये हुए कार्यों की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया था।

स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति

ब्रिटिश लोगों के खिलाफ लड़ने की जिन लोगों की शैली गाँधीवादी नहीं थी वे उन युवाओं में शामिल थे। उनका विश्वास लाल-बाल-पाल के चरमपन्थी तरीकों में विश्वास रखता था। भगत सिंह जी ने यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलन का अध्धयन किया तथा अराजकता और साम्यवाद के प्रति आकर्षित हो गये थे।

भगत सिंह जी ने उन लोगों को अपने साथ लिया जो अहिंसा की जगह पर आक्रामक तरीके से क्रांति लाने में विश्वास रखते थे। उनके काम के तरीकों की वजह से लोग भगत सिंह जी को नास्तिक, साम्यवादी और समाजवादी के रूप में जानने लगे थे।

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पुनर्निर्माण की आवश्यकता

 भगत सिंह को इस बात का एहसास हुआ कि केवल ब्रिटिशों को देश से बाहर निकालने देश के लिए अच्छा नहीं है। भगत सिंह इस बात को समझ गये थे कि जब तक भारत की राजनीति का पुनर्निर्माण नहीं होता तब तक ब्रिटिश शासन का विनाश नहीं किया जा सकता है।

भारत की राजनीति के पुनर्निर्माण के लिए श्रमिकों को शक्ति दी जानी चाहिए। भगत सिंह जी ने बीके दत्त के साथ सन् 1929 में एक बयान में क्रांति के बारे में राय जाहिर की जिसमें उन्होंने कहा कि क्रांति का मतलब है चीजों को वर्तमान क्रम से जो स्पष्ट रूप से अन्याय पर निर्भर हैं उन्हें बदलना चाहिए। मजदूर देश के सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं लेकिन फिर भी उनके मालिकों के द्वारा उन्हें लूटा जा रहा है और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।

किसान देश के लिए अनाज उगाता है लेकिन उसके खुद के खाने के लिए कुछ नहीं होता है और बुनकर जो दूसरे लोगों के लिए कपड़ा बुनते हैं उनके पास अपने बच्चों का शरीर ढंकने के लिए भी कपड़े नहीं होते हैं, जो मिस्त्री और मजदूर होते हैं वो दूसरे लोगों के लिए शानदार महल बनाते हैं लेकिन उनके खुद के रहने के लिए छत भी नहीं होती है। लाखों पूंजीपति लोग अपने शौक पूरा करने के लिए लाखों रुपए खर्च कर देते हैं।

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मृत्यु Death of Bhagat Singh

1929 में केंद्रीय असेंबली में  बम फेंकने से पहले ही इन्होंने सोच लिया था कि उन्हें जो भी सजा दी जाएगी उसे स्वीकार कर लेंगे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने मिलकर जानबूझकर ऐसी जगह बम फेंका था जहां पर लोग मौजूद न हो।

घटना के बाद अंग्रेजी ऑफिसर द्वारा सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। 26 अगस्त 1930 को भारतीय दंड संहिता के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुना दी गई।

देश के कई भारतीय वकीलों ने इस सजा को टालने की कोशिश की किंतु ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया।

 23 मार्च 1930 की शाम को उन तीनों अमर क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। उस समय वहां पर जो भी भारतीय उपस्थित थे वे अपने आंसू रोक नहीं पाए।

ऐसा बताया जाता है कि जब भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु फांसी के लिए ले जाए जा रहे थे तब वह एक ही गीत गुनगुना रहे थे –  मेरा रंग दे बसंती चोला..

फांसी होने के बाद अंग्रेजी सरकार  लोगों के उमड़ रहे भीड़ को देखकर इतना खौफ में आ गई थी के उन शहीदों के मृत शरीर के टुकड़े करके बोरी में भरकर फिरोजपुर ले जाकर मिट्टी के तेल से जला दिया।

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जब लोगों को इस बात का पता लगा तो उसी दिशा में आगे बढ़ने लगे। लोगों की भीड़ आते देख अंग्रेजों ने बचे कुचे टुकड़ों को नदी में फेंक दिया और वहां से भाग गए।

जब गांव वाले पास आए तब उन्होंने उनके मृत शरीर के टुकड़ों को एकत्रित करके विधिवत दाह संस्कार किया।

Credit: Calligraphy Creators

उपसंहार

भगत सिंह की शहादत से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली बल्कि नवयुवकों के लिए भी वह प्रेरणा स्रोत बन गए। वह देश के समस्त शहीदों के सिरमौर बन गए। भारत और पाकिस्तान की जनता उन्हें आजादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानीसहित सारी जिंदगी देश के लिए समर्पित कर दी। उनके जीवन पर आधारित कई हिन्दी फिल्में भी बनी हैं जिनमें- द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, शहीद, शहीद भगत सिंह आदि। आज भी सारा देश उनके बलिदान को बड़ी गंभीरता व सम्मान से याद करता है।

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